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Tuesday, June 27, 2017

कोई हलन - चलन नहीं है ..........

कोई हलन - चलन नहीं है
कोई चिंतन - मनन नहीं है
कोई भाव - गठन नहीं है
कोई शब्द - बंधन नहीं है

स्वरूप है कोई क्रिया - रहित
बिन साधना हुआ है अर्जित
स्वभाव से ही स्वभाव निर्जित
बोध - मात्र से ही है कृतकृत्य

शांत क्षणों को कोई गढ़ा है
अनंत अर्थों को जिसमें मढ़ा है
अहो दशा में जिसे मैंने पढ़ा है
पाठ - रस और - और बढ़ा है

चिंतना टूटी - मैं कैसी हूँ !
अचिंत्य हुई - मैं कैसी हूँ ?
उसी में हूँ , जो हूँ , जैसी हूँ
वो है जैसा - मैं भी वैसी हूँ

अब क्या सुनना , अब क्या कहना ?
प्रश्नों से भी क्या अब प्रश्न वाचना ?
आप्त उत्तर को ही है अब आँकना
हाँ ! अशेष दिखा , उसी में झाँकना .

14 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (29-06-2017) को
    "अनंत का अंत" (चर्चा अंक-2651)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. बहुत सुंदर भाव..कबीर ने भी कहा है..जब जैसा तब तैसा रे..

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  3. जीवनदर्शन की पड़ताल करती हुई कविता आई है.

    उसी में हूँ, जो हूँ, जैसी हूँ
    वो है जैसा - मैं भी वैसी हूँ

    जीवन को 'अब, अभी और यहीं' के परिप्रेक्ष्य में तलाशती है आपकी कविता. कवित्व उदास तो है लेकिन उदात्त होता दिखा है.

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  4. शांत गहरा समुन्दर सा चिंतन ... अनंत भाव पर स्थिर मंथन है गहरी रचना ....

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  5. कोई हलन - चलन नहीं है
    कोई चिंतन - मनन नहीं है

    वाह! वाह! बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति अमृता तन्मय जी.
    भरपूर चिंतन मनन है जी.

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  6. अर्थपूर्ण ... विचारणीय | आपकी कविताएँ मन को छूती हैं , हमेशा

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  7. बहुत खूब ,
    हिन्दी ब्लॉगिंग में आपका लेखन अपने चिन्ह छोड़ने में कामयाब है , आप लिख रही हैं क्योंकि आपके पास भावनाएं और मजबूत अभिव्यक्ति है , इस आत्म अभिव्यक्ति से जो संतुष्टि मिलेगी वह सैकड़ों तालियों से अधिक होगी !
    मानती हैं न ?
    मंगलकामनाएं आपको !
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  8. सब्दों से अगर जी पता
    सदियों तक रुक जाता
    फिर कहाँ वेदना होती
    और कहां विरह रुक पाता।

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  9. डूब जाएँ या तिनके का सहारा ले निकल आयें
    दावानल हो या रेगिस्तान
    शब्द पा ही लेते हैं अर्थ !!!

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  10. अशेष में झाँकने के यत्न अपने आप में एक उपलब्धि हैं .

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  11. बहुत गहन और सार्थक चिंतन...

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  12. कविता के माध्यम से अध्यात्म तक पहुंचना कैसे होता है, वही गुप्त भावनाएं यहाँ अपूर्व अनुभवों के साथ प्रकट हैं. कितना सुन्दर है यह सब कुछ.

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  13. कविता के माध्यम से अध्यात्म तक पहुंचना कैसे होता है, वही गुप्त भावनाएं यहाँ अपूर्व अनुभवों के साथ प्रकट हैं. कितना सुन्दर है यह सब कुछ.

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