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Wednesday, October 18, 2017

मन रे !

मन रे , भीतर कोई दीवाली पैदा कर !
अँधेरा तो केवल
उजाला न होने का नाम है
उससे मत लड़
बस उजाला पैदा कर !

कभी दीया मत बुझा
हर क्षण जगमगा कर
आँखों को सुझा !
जो दिखता है
कम - से - कम उतना तो देख
और मत पढ़ अँधेरे का लेख !

कर हर क्षण उमंग घना
बसंत सा - ही उत्सव मना !
मत रुक - क्योंकि तू तो
गति के लिए ही है बना !

मत देख - आगत या विगत
तू ही है संपूर्ण जगत !
जगत यानी जो गत है
जो जा रहा है
जो भागा जा रहा है
उत्सव मना , उत्सव मना
अर्थ अनूठा बतलाये जा रहा है !

हर क्षण बसंत हो !
हर क्षण दीवाली हो !
मंद - मंद ही मगर
हर क्षण , हर क्षण
तेरी लौ में लाली हो !

अँधेरा तो केवल
उजाला न होने का नाम है
मन रे , भीतर कोई दीवाली पैदा कर !


*** दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ ***

Tuesday, August 15, 2017

शाश्वत झूठ ........

हर पल
मैं अपने गर्भ में ही
अपने अजन्मे कृष्ण की
करती रहती हूँ
भ्रूण - हत्या
तब तो
सदियों - सदियों से
सजा हुआ है
मेरा कुरुक्षेत्र
हजारों - हजारों युद्ध - पंक्तियाँ
आपस में बँधी खड़ी हैं
लाखों - लाख संघर्ष
चलता ही जा रहा है
और मेरा
हिंसक अर्जुन
बिना हिचक के ही
करता जा रहा है
हत्या पर हत्या
क्योंकि
वह चाहता है
शवों के ऊपर रखे
सारे राज सिंहासनों पर
अपने गांडिव को सजाना
और महाभारत को ही
महागीता बनाना
इसलिए
वह कभी
थकता नहीं है
रुकता नहीं है
हारता नहीं है
पर उसकी जीत के लिए
मेरे अजन्मे कृष्ण को
हर पल मरना पड़ता है
मेरे ही गर्भ में .......
मैं अपने इस
शाश्वत झूठ को
बड़ी सच्चाई से सबको
बताती रहती हूँ
कि मेरा कृष्ण
कभी जनमता ही नहीं है
और मैं
झूठी प्रसव - पीड़ा लिए
प्रतिपल यूँ ही
छटपटाती रहती हूँ
कि मेरा कृष्ण
कभी जनमता ही नहीं है .

Friday, August 11, 2017

काफी हो ..........

जितने मिले हो
मेरे लिए , तुम उतने ही काफी हो
ख्वाहिशें जो गुस्ताखियां करे तो
तहेदिल से मुझे , शर्तिया माफी हो

बामुश्किल से मैंने
तूफां का दिल , बेइजाज़त से हिलाया है
कागज की किश्ती ही सही मगर
बड़ी हिम्मत से , उसी में चलाया है

जरूरी नहीं कि , जो मैंने कहा
तेरे दिल में भी वही बात हो
पर मेरी तकरीर की लज्जत में
मेरे वजूद के जज़्ब जज़्बात हो

तेरे चंद लम्हों की सौगात में मैंने
इत्तफ़ाक़न इल्लती सौदाई को जाना है
गर इरादतन खुदकुशी कर भी लूं तो
ये मेरे शौक का ही शुकराना है

सोचती हूँ , कहीं तो तेरे दिल से मिल जाए
ये सहराये - जिंदगी के गुमशुदा से रास्ते
तो पूरी कायनात के दामन को निचोड़ दूँ
बस तेरी बदमस्त बंदगी के वास्ते .

Thursday, August 3, 2017

सच्चाई .........

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
बहुत - बहुत रूप हैं , बड़े - बड़े भेद हैं
और जो - जो कान उसे सुन पाते हैं
बेशक , उनमें भी बहुत बड़े - बड़े छेद हैं

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
बड़ी - बड़ी समानताएं हैं , बड़ी - बड़ी विपरितताएं हैं
और इनके बीच मजे ले - लेकर झूलती हुई
सुनने वालों की अपनी - अपनी चिंताएँ हैं

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
बड़े - बड़े संवाद हैं , बड़े - बड़े विवाद हैं
जिसमें कुछ कहकर तो कुछ चुप - सी
वही ओल - झोल वाली फरियाद है

मेरी अंतरात्मा की आवाज से
खुल - खुल कर पलटी मारती हुई
एक - सी ही जानी - पहचानी परिभाषा है
उसकी हाज़िर - जवाबी का क्या कहना ?
वह पल में तोला तो पल में ही माशा है

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
सामयिक सिधाई है , दार्शनिक ढिठाई है
उसकी ओखली में , जो - जो बीत जाता है
उसी की रह - रह कर ,  कुटाई पर कुटाई है

मेरी अंतरात्मा की आवाज में
एक - सा ही छलावा है , एक - सा ही (अ) पछतावा है
उसकी गलती मानने के हजार बहानों में भी
एक - सा ही ढल - मल दावा है

मेरी अंतरात्मा की आवाज
अपने - आप में ही इतनी है लवलीन
तब तो अन्य आत्माओं की आवाज को
लपलपा कर लेती है छीन

अतः हे मेरी अंतरात्मा की आवाज !
जबतक तुम संपूर्ण ललित - कलाओं से लबालब न हुई तो
तुम्हारी कोई भी ललकित आवाज , आवाज नहीं होगी
और तुम में लसलसाती हुई सच्चाई नहीं हुई तो
तुमसे गिरती हुई कोई ग़रज़ी गाज , गाज नहीं होगी .

Friday, July 21, 2017

प्रासंगिकता ......

सूक्ष्म से
सूक्ष्मतर कसौटी पर
जीवन दृष्टि को
ऐसे कसना
जैसे
अपने विष से
अपने को डसना ....
गहराई की
गहराई में भी
ऐसे उतरना
जैसे
अपनी केंचुली को
अपनापा से कुतरना .....
महत्वप्रियता
सफलता
लोकप्रियता
अमरता आदि को
रेंग कर
ऐसे
आगे बढ़ जाना
जैसे
जीवन - मूल्यों की
महत्ता को
प्रेरणा स्वरूप पाना .....
जैसी होती है
कवित्त - शक्ति
वैसी ही
होती है
अंतःशून्यता की
भाषिक अभिव्यक्ति .....
जब
प्रश्न उठता है
कि प्रासंगिक कौन ?
तब
कवि तो
होता है मौन
पर कविता तो
हो जाती है
सार्वजनिक
सार्वकालिक
सार्वभौम .

Saturday, July 15, 2017

कहो तो ..........

कहो तो
तुम्हारे लिए
रचने को तो मैं रच दूँ
रूप- यौवन का नित नया संसार
तुम्हें स्वयं में , ऐसे डुबा लूँ कि
मैं ही हो जाऊँ माँझी और मैं ही मँझधार........

कहो तो , तुम्हारे लिए
नित नये गीतों को दे दूँ मैं उत्तेजित उद्गार
कहो तो , नित नई वीणा पर छेड़ दूँ रति- राग अनिवार
कहो तो , नित नये बाँसुरी पर उठा दूँ
अनउठी कामनाओं को बारंबार
कहो तो , इस मेघावरण में मृदंग पर
थाप दे- देकर थिरका दूँ मैं मदकल मल्हार
और कहो तो
तुम्हारी थरथराती वासनाओं को
दे दूँ मैं तड़फती हुई तृप्ति की धार.......

कहो तो
तुम्हारे लिए
अपने प्रत्येक पंखुड़ी पर मैं
प्राणपण से परिमल पराग पसार दूँ
कहो तो , कमलिनी को कलि से फूल बनने में
जो क्लेश होता है , उसे मैं बिसार दूँ
कहो तो , तुम्हारे प्रत्येक याम के कसक को
मैं मतवाली मधु- यामिनी से संवार दूँ
या कहो तो
संकल्पित स्तंभन बन कर मैं
संभ्रांत स्खलन से तुम्हें मैं उबार लूँ ...........

कहो तो
तुम्हारे लिए
रचने को तो मैं रच दूँ
रंग- यौवन का नित नया संसार
पर प्रिय !
मैं हूँ इस पार और तुम हो उस पार
और बीच में है , अलंघ्य वासनाओं का पारापार
तब भी तुम कहो तो
तुम्हारे लिए
मैं ही कर लेती हूँ पार
या कर लेती हूँ सब सहज स्वीकार .

Sunday, July 9, 2017

अतिश्योक्ति की दिशा में गतिमान हो गई हूँ ......

गुणियों ! गुरु - गुण गा - गा कर मैं तो गुण - गान हो गई हूँ
सुधियों ! सुध खो - खो कर अधिक ही सावधान हो गई हूँ
मुनियों ! मन - मधु पीते - पीते मैं भी मधुर मुस्कान हो गई हूँ 
अरे ! अतिश्योक्ति की दिशा में अब तो गतिमान हो गई हूँ 

मुस्कान में है तन्मय , तन्मय में है अमृतायन
अमृतायन में है नर्त्तन , नर्त्तन में है गायन
गायन में है वादन , वादन है बड़ा पावन
पावन सा है रमण , रमण से है जीवन

मधु - मन में जब न यह मेरा है , न वह मेरा है
तब ठहराव कहाँ ? जो है बस गति का फेरा है
अलियों- कलियों की गलियों में रास का डेरा है
गुरु में हुई मैं अब तन्मय जो अमृत का घेरा है 

परिधि में है प्राण , प्राण में है उड़ान
उड़ान से है आकाश , आकाश है वरदान
वरदान से है अवधुपन , अवधुपन में है ध्यान
ध्यान में है दर्शन , दर्शन में अभिराम

संगम पर समेट रही मैं मद की मधुर उफान
गुरु- रस से भीगी- भागी है हिय- कोकिल की तान
मैंने खोला है बाँहों को , आलिंगन में है प्राण
तब तो सहस्त्र सिंगार रच- रच के मुस्काये मुस्कान 

गुणियों ! गुरु - गुण गा - गा कर मैं तो गुण - गान हो गई हूँ
सुधियों ! सुध खो - खो कर अधिक ही सावधान हो गई हूँ .

Tuesday, June 27, 2017

कोई हलन - चलन नहीं है ..........

कोई हलन - चलन नहीं है
कोई चिंतन - मनन नहीं है
कोई भाव - गठन नहीं है
कोई शब्द - बंधन नहीं है

स्वरूप है कोई क्रिया - रहित
बिन साधना हुआ है अर्जित
स्वभाव से ही स्वभाव निर्जित
बोध - मात्र से ही है कृतकृत्य

शांत क्षणों को कोई गढ़ा है
अनंत अर्थों को जिसमें मढ़ा है
अहो दशा में जिसे मैंने पढ़ा है
पाठ - रस और - और बढ़ा है

चिंतना टूटी - मैं कैसी हूँ !
अचिंत्य हुई - मैं कैसी हूँ ?
उसी में हूँ , जो हूँ , जैसी हूँ
वो है जैसा - मैं भी वैसी हूँ

अब क्या सुनना , अब क्या कहना ?
प्रश्नों से भी क्या अब प्रश्न वाचना ?
आप्त उत्तर को ही है अब आँकना
हाँ ! अशेष दिखा , उसी में झाँकना .

Tuesday, January 31, 2017

विकल्पहीनता में .......

इस विगंधी वातावरण में
कितना कठिन हो गया है
कवि- हृदय को बिकसाना
यदि बिकस भी गया तो
और भी कठिन हो गया है
उसे मिलावट व बनावट से बचाना

जहाँ अर्थ है , काम है , भोग ही मनबहलाव है
वहाँ प्रेम भी बाड़ी- झाड़ी में उग- उग कर
बड़े प्रेम से हाट- खाट पर बिक- बिक जाता है
तब बौखलाया- सा कवि- हृदय
बेकार ही कड़वाहट को पी- पीकर
शब्दों की कालकोठरी में छुपकर छटपटाता है

क्या सपनों से सूखा , बंजर खेत है हरियाता ?
या सिर्फ कल्पनाओं से ही वसंत है आता ?
या भावनाओं से जीवन- तत्व है बदल जाता ?
तब कवि- हृदय चाहता है कि चुप रह जाए
विकल्पहीनता में जो हो रहा है , देखता जाए
और बिना आहट के , अनजान- सा निकल जाए

आग्रहों- दुराग्रहों का चश्मा कैसे तोड़ा जाए ?
शंकाओं- संदेहों के गोंद को कैसे छोड़ा जाए ?
कथ्यों- तथ्यों को कैसे सहलाया जाए ?
और आयोजनों- प्रयोजनों को कैसे समझाया जाए ?
या तो कवि- हृदय को ही है बना- ठना कर बहलाना
या फिर सीख लिया जाए बस बेतुकी बातें बनाना .

Sunday, January 22, 2017

रस तो ...........

जानती हूँ , इस प्राप्त वृहद युग में
कैसे बहुत छोटा- सा जीवन जीती हूँ
रस तो अक्ष है, अद्भुत है , अनंत है
पर अंजुरी भर भी कहाँ पीती हूँ ?

विराट वसंत है , विस्तीर्ण आकाश है
चारों ओर मलयज- सा मधुमास है
पर सीपी से स्वाति ही जैसे रूठ गई है
औ' आर्त विलाप से ही वीणा टूट गई है

सुमन- वृष्टि है , विस्मित- सी सृष्टि है
पर भविष्योन्मुख ही सधी ये दृष्टि है
आँखें मूंदे- मूंदे हर क्षण बीत जाता है
औ' स्वप्न जीवन से जैसे जीत जाता है

विद्रुप हँसी हँस लहलहाती है ये लघुता
कभी तो किसी कृपाण से कटे ये कृपणता
विकृत विधान है , असहाय स्वीकार है
छोटा- सा जीवन जैसे बहुत बड़ा भार है

बस व्यथा है , वेदना है , दुःख है , पीड़ा है
भ्रम है , भूल है , पछतावा है , पुनरावृत्ति है
स्खलन है , कुढ़न है , अटकाव है , दुराव है
अतिक्रामक निर्लज्जता से निरुपाय कृति है

मानती हूँ , इस प्राप्त वृहद युग में
कैसे बहुत छोटा- सा जीवन जीती हूँ
रस तो अक्ष है, अद्भुत है , अनंत है
पर अंजुरी भर भी कहाँ पीती हूँ ?

Saturday, December 31, 2016

कि मौन सर्जन प्रक्रिया है .....

सूक्ष्म- चित् ऐसे सोया है
कि मौन सर्जन प्रक्रिया है
पुनः कोई रस- गीत गा दो
प्राण! तुम अब मुझे जगा दो

इंद्रधनुओं के रंग छूकर
हों कोमल भाव मुखर
उर- विषाद को गिरा दो
प्राण! तुम मुझे सिरा दो

ताप तुमसे कहूँ मैं गोपन
धूम से भरा- भरा है मन
लदा हुआ तमस हटा दो
प्राण! तुम संशय मिटा दो

है ऊब बाहर के जगत से
या भीतर रार है सत से
ऊब- रार में न उलझा दो
प्राण! तुम मुझे सुलझा दो

प्राण! तुम शब्दों को सहला दो
अनभिव्यक्त भाषा ही कहला दो
कि मौन सर्जन प्रक्रिया है
औ' सूक्ष्म- चित् सोया है .


*** नव वर्ष संपूर्ण वैभव से सुशोभित हो***
            ***शुभकामनाएँ***

Tuesday, November 29, 2016

लिखती रहूँ प्रेमपत्र .........

शब्दों के आँखों में
भरे आँसुओं को छुपाकर
उसके हृदय का
सारा दुःख दबाकर
ओठों पर बस
सुंदर मुस्कान लाकर
तुम्हें लिखती रहूँ
प्रेमपत्र .........

उस प्रेमपत्र में मैं लिखूँ
घर- आँगन की बातें
अपने गली- मोहल्ले की बातें
और देश- दुनिया की बातें
बातें ही बातें
ढेर सारी बातें ..........

भूली- बिसरी स्मृतियों में
डूबते हुए , उतराते हुए
हँसते हुए , मुस्कुराते हुए
तुम उन सब बातों में
कभी मत पढ़ना
अनलिखे प्रेम को .....

अगर पढ़ने लगे तो
शब्द स्वयं पर
अपना वश न रख पायेंगे
ओंठों से तो न सही
पर अपने आँसुओं से
न जाने
क्या- क्या कह जाएँगे ........

अब तुम ही कहो
कहीं प्रेमपत्र में
कभी आँसुओं का हाल
लिखकर कहा जाता है ?
ये अलग बात है कि
अब तुम्हारे बिना
एक पल भी
नहीं रहा जाता है ......

बस शब्दों के ओंठों पर
तुम अपने ओंठों को
मत धर देना
और उनके आँसुओं को
अपनी आँखों में
मत भर लेना ........

तब शब्दों के
हृदय का सारा दुःख
दुख- दुख कर
उसी पल बह जाएगा
और मेरा प्रेमपत्र
प्रेमपत्र न रह पाएगा .

Monday, November 21, 2016

बसंत आ गया ? .......

अरे !
बिन बुलाए , बिन बताए
बिन रुत के ही ऐसे कैसे
बसंत आ गया ?
आया तो आया पर
कौए और कोयल का भेद
बिन कहे ही ऐसे कैसे
सबको बता गया ?

कोयल तो
नाच कर , स्वागत गान कर
चहुँओर कूक रही है
और कौए ?
आक्रोश में हैं , अप्रसन्न हैं
जैसे उनपर दुःखों का आसमान
अचानक से टूट पड़ा हो
और उनकी आत्मा
चिचिया कर हूक रही है ......

बेचारे कौए
बड़ी चेष्टारत हैं कि
कोयल से भी गाली उगलवाये
और वे बोले तो
सब ताली बजाये ...
ताली तो बजती है
जहाँ वे मुँह खोलते हैं तो
अपने- आप बजती है
लेकिन उन्हें उड़ाने के लिए
कि भागो , जाओ
कि अब दुबारा इधर न आओ .......

कुछ कौए उड़े जा रहे हैं
बसंत को ही अंट- संट
कहे जा रहे हैं
पर वे पूरब जाए या पश्चिम
उत्तर जाए या दक्षिण
सबसे ढेला ही खायेंगे अनगिन ........

जबतक वे कंठ नहीं बदले तो
उनके गीत का
कहीं भी गान नहीं होगा
वे कितना भी
अंटिया- संटिया जाए
तो भी बसंत का
कभी अपमान नहीं होगा .

Sunday, October 30, 2016

तो ऐ दीये ! ........

तुम्हारे हृदय में भी
आग तो सुलगती होगी
चेतना की चिंगारी
अपने चरम को
छूना चाहती होगी
तुम्हारी लवलीन लपटें
मुझसे तो कह रही है कि
तुम भी खो जाना चाहते हो .....
तो ऐ दीये !
मुझ अंधियारी की
तुम साधना करो
जिससे
तुम्हारा प्रकाश
तुमसे भी पार हो जाए
और मेरे पास !
मेरे पास तो
हर पल है तुम्हारा
और है
प्रेम भरी अनंत प्रतीक्षा
अंधकार सा ही
स्रोतहीन , शाश्वत .



दीपोत्सव की स्वर्णिम रश्मियाँ बहुविध आलोकित हो ।
               ***शुभ दिवाली***

Friday, October 7, 2016

तू मधुपान कर माँ !

हे मधुरी, हे महामधु, हे मधुतर
तू सबका त्राण कर माँ !
सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

मेरे पथ की सुपथा !
वाचालता मेरी नहीं है वृथा
असमर्थ स्तुति रखती हूँ यथा
तू मत लेना इसे अन्यथा
नत निवेदन है, आदान कर माँ !
प्रसन्न हो, प्रसन्न हो, प्रसन्न हो
प्रतिपल प्रसन्नता प्रदान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

गदा, शूल, फरसा, वाण, मुदगर
तनिक तू इन सबको बगल में धर
और अपने अत्यंत हर्ष से
रोम- रोम को रोमांचित करके
अदग अभिलाषाओं का आधान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

तेरा मुख मन्द मुस्कान से सुशोभित है
तू कमनीय कान्ति से कीलित है
तू मंगला है, शिवा है, स्वाहा है
तू ही अक्षय, अक्षर प्रणव- प्रकटा
प्रतिदेय प्रतिध्वान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

तेरी ही निद्रा से खींचे हुए
पुण्यात्माओं का चित्त भी
तेरी महामाया में फँस जाता है
और दुरात्माओं का क्या कहना ?
उनका तो प्रत्येक कृत्य ही
पाप- पंक में धँस जाता है
क्षमा कर, क्षमा कर, क्षमा कर
सबको क्षमादान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

पुण्य घटा है, पाप बढ़ा है
तब तो तुझे क्रोध चढ़ा है
उदयकाल के चन्द्रमा की भाँति
अपने मुख को लाल न कर
तू तनी हुई भौहों को
और अधिक विकराल न कर
तेरे भय से भयभीत हैं सब
सबको अभयदान कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

तेरे हृदय में कृपा
और क्रोध में निष्ठुरता
केवल तुझमें ही दोनों बातें हैं
इसलिए जगत का कण- कण मिलकर
क्षण- क्षण तेरी स्तुति गाते हैं
हे सुन्दरी, हे सौम्या, हे सौम्यतर
तनिक अपने सिंह से उतर कर
सबका कल्याण कर माँ !

सबपर प्रसन्न होकर
तू मधुपान कर माँ !

Friday, September 30, 2016

खालिस पंडिताऊ बोल .......

सबका अपना तबेला
सबकी अपनी दौड़
लँगड़ी मारे लँगड़ा
लड़बड़ाये कोई और

अब्दुल्ला का ब्याह
बेगाने माथे मौर
बारूद मारे माचिस
धुँधुआये कोई और

कोई बजाये पोंगली
कोई फाड़े ढोल
पोंगा बढ़कर बाँचे
खालिस पंडिताऊ बोल

कोई चटाये चूना
कोई चबकाये पान
कथ्था मारे कनखी
थूक फेंके पीकदान

कोई दबाये कद्दू
कोई बढ़ाए नीम
पिटारा भर बीमारी
चुप्पी साधे हकीम

कोई कबूतर झपटे
कोई उड़ाये बाज
छिछला छुड़ाये छिलका
गुदा छुपाये राज

आजादी माँगे आजादी
जंजीर पहने जंजीर
नट भट मिलकर
खेले एक खेल

इसकी उसकी डफली
बस अपना राग
कोई मनाये मातम
कोई फैलाये फाग .

Saturday, September 24, 2016

गुमान .......

खामोश रहने में भी
तीर हो सकते हैं
काँटे हो सकते हैं
जहर हो सकता है
व कलंदरों के
रोशन कलाम में भी
हौलनाक तल्ख़िए- होश
या फिर ये कहिए कि
कातिल कलह हो सकता है ......

यूँ ही कुछ भी हो सकने
व न हो सकने के
बीच का फ़ासला
किसी फ़ासिद का शिकार
न होता तो
क्या कहना था
जख्मों की जलन को भूला कर
ख़ामोशी में खलल डाले बगैर
ज़ियादती सह कर
किसी तरह रहना था ......

किसी असर के लिए
उम्रभर की दुहाई
गुजरे जमाने का था बहाना
गोया आह ने सीख लिया हो
ख़ता पर ख़ता करके
खुद-ब-खुद मुस्कुराना .....

किस्मत व फितरत की राजदारी में
कोई तख़्त बनाता है
तो कोई तख़्त बचाता है
गरजे कि
अक्ल के इस दौर में
तौबा मचा कर भी
दुनिया पे जन्नत का
खूबसूरत गुमान हो आता है .

Monday, September 19, 2016

पियहद ही बिसराम .........

तृषा जावै न बुंद से
प्रेम नदी के तीरा
पियसागर माहिं मैं पियासि
बिथा मेरी माने न नीरा

सहज मिले न उरबासि
आसिकी होत अधीर
घर उजारि मैं आपना
हिरदै की कहूँ पीर

दीपक बारा प्रेम का
विरह अगिन समाय
तलहिं घोर अँधियारा
किन्हुं न पतियाय

जो बोलैं सो पियकथा
दूजा सबद न कोय
सबद- सबद पियहिं पुकारिं
पिय परगट न होय

सुमिरन मेरा पिय करे
कब आवै ऐसों ठाम
पिय कलपावै आतमा
पियहद ही बिसराम .

Wednesday, September 14, 2016

हे देवी हिन्दी ! .....

" या देवि सर्वभूतेषु हिन्दीरूपेण संस्थिता ।
  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः "


हे सृष्टिस्वरूपिणी !
हे कामरूपिणी !
हे बीजरूपिणी !
जो जिस भाव और कामना से
श्रद्धा एवं विधि के साथ
तेरा परायण करते हैं
उन्हें उसी भावना और कामना के अनुसार
निश्चय ही फल सिद्धि होती है .......

हे भाषामयी !
हे वांङमयी !
हे सकलशब्दमयी !
हृदय में उदित भव भाव रूप से
मन में संकल्प और विकल्प रूप से
एवं संसार में दृश्य रूप में
अब तुम्हारे स्वरूप का ही दर्शन है .....

हे ज्योत्सनामयी !
हे कृतिमयी !
हे ख्यातिमयी !
अब बिना किसी प्रयत्न के ही
संपूर्ण चराचर जगत में
मेरी यह स्थिति हो गई है कि
मेरे समय का क्षुद्रतम अंश भी
तुम्हारी स्तुति , जप , पूजा
अथवा ध्यान से रहित नहीं है .....

हे शक्तिमयी !
हे कान्तिमयी !
हे व्याप्तिमयी !
इस बात को स्वीकार कर
मैं अति आह्लादित हूँ कि
मेरे संपूर्ण जागतिक आचार और व्यवहार
तुम्हारे प्रति यथोचित रूप से
व्यवहृत होने के कारण
तुम्हारी ही पूजा के रूप में
पूर्णतः परिणत हो गये हैं .

हे देवी हिन्दी !

Monday, September 12, 2016

अपना ही पोस्टमार्टम कराना है ...........

क्या पता कि मैं आदमी ही झक्की हूँ
या अपने इरादे की पूरी पक्की हूँ
सुखरोग टाइप बीमार हूँ
फ्री में मिलती सहानुभूति की शिकार हूँ
सबके सामने बस अपना दुखड़ा रोती हूँ
नई बीमारियों को अपने लम्बे लिस्ट में पिरोती हूँ ....

मुझपर रिसर्च करते कई - कई डॉक्टरों की टीम है
और हाथ साफ करते बड़े - बड़े नीम - हकीम हैं
मेरा घर ही जैसे कोई बड़ा अस्पताल है
पर सुधार से एकदम अनजान मेरा हाल है .....

नींद आती है तो मजे से सो जाती हूँ
आँख खुलती है तो जग जाती हूँ
पैर बढ़ाती हूँ तो चलने लगती हूँ
रुकती हूँ तो रुक जाती हूँ ........

मुँह खोलती हूँ तो बोलने लगती हूँ
बंद करती हूँ तो चुप हो जाती हूँ
भूख लगती है तो भरपेट खा लेती हूँ
प्यास लगती है तो भर मन कुछ पी लेती हूँ
हद है , हँसती हूँ तो हँसने लगती हूँ
जो रोती हूँ तो रोने लगती हूँ .......


और तो और , सही करती हूँ तो सही होती हूँ
जो गलत करती हूँ तो गलत होती हूँ
आखिर कैसी ये मेरी बीमारी है ?
जिसे समझने में , सब समझ भी हारी है ......

वैसे उटपटांग हरकतों से मैं कोसों दूर हूँ
शायद आदमी ही होने के लिए मजबूर हूँ
जब लोगों को देखती हूँ , वे मुझे भरमाते हैं
जो मेंटल हेल्थ प्रूफ दिखा , क्या से क्या हो जाते हैं ......

डॉक्टर बार - बार मेरा सारा टेस्ट करा रहे हैं
पर हाय ! मेरी बीमारी को ही लापता बता रहे हैं
ई.सी.जी. , एम.आर.आई. , अल्ट्रासाउंड , सी.टी. स्कैन
सब मेरा बॉयकाट कर , मुझपर लगा दिए हैं बैन
मेडिकल साइंस इसे एक क्रिटिकल केस बता रहा है
और मुझपर लगातार बीमारी का दौरा आ रहा है .....

क्या पता कि मैं आदमी ही झक्की हूँ
पर अपने इरादे की पूरी पक्की हूँ
अब अपना इलाज मुझे खुद ही करना है
या तो ठीक होकर जीना है या फिर मरना है
इसलिए किसी भी कीमत पर बीमारी का पता लगाना है
हाँ , अपनी आँखों के आगे अपना ही पोस्टमार्टम कराना है .

Friday, September 2, 2016

एक खुली कविता - श्री श्री श्री मोदी जी के लिए ..........तुम तो अमर हो गए .

क्या तुम
सबके वमन किए विष को
प्रेम से पी - पी कर
सच में हर हो गए ?
या अभिन्न होने के लिए
हर एक अंश के नीचे होकर
यथातथ हर हो गए ?

हो न हो , कहीं तुम
आधार और आधेय में
संबंध बनाते - बनाते
सबके बीच के
प्रयोगी पर हो गए
या कि लगातार - लगातार
हर बाद में लग - लग कर
पूरी तरह से
प्रसक्त पर हो गए ....

हाँ , कहीं ऋण रूप में
तो कहीं धन रूप में
कोने - कोने में बस
तुम्हारी ही
कहन और कहानी है
जो तुम पानी बचाते हो तो
पाहनों से भी
परसता पानी है
या स्वयं तुम
इतिहास में इसतरह से
अमर होने के लिए
कर्मतत्पर , कर्मपूरक और कर्मयोगी
हो रहे हो और
वर्तमान से कहला रहे हो कि
तुम वरणीय वर हो गए ......

ऐसे में तुम तो
अमर हो गए ....

तब तो दुधारी दंड से
साम , दाम , दंड , भेद को ही
भूचाली भेदिया की तरह
भेद - भेद कर तुम
इस कलुषित कलियुग में भी
युगपत् द्वापर हो गए .....

हाँ ! तुम तो
अमर हो गए ........

अब तनिक
त्रेता के त्रुटियों को भी
अभिमंत्रित करके
कुछ तो असार कर दो
वो पूर्ण रामराज्य
न आए न सही
कम - से - कम एक
प्रचंड पूर्य हुंकार भर दो ....

देखते ही देखते
अशंक आशाओं के
तुम अगिन लहर हो गए
अरे ! तुम तो
अमर हो गए ....

सब सुंदर सपनों को
सब आँखों में भर दो
शिव - शक्ति को
सब पाँखों में जड़ दो
सत्य है , सत्य है
तुम स्नेहिल , स्तुत्य सा
सतयुगी डगर हो गए
अहा ! तुम तो
अमर हो गए ....

अब तुम भी
अपना सत्य कहो
कि सच में तुम
अमर होना चाहते हो
या समय ने है तुम्हें चुना ?
दिख तो रहा है कि
तुम्हारे लिए ही
बहुत महीनी से
महीन - महीन
ताना - बाना है बुना.....

तब तो
चारों युगों के समक्ष
तुम सम्मोहक समर हो गए....

सच में , तुम तो
अमर हो गए .

Saturday, August 27, 2016

खोल रही हूँ खुद को ........

खोल रही हूँ खुद को
खाली खोल से
खोल कर
खोखले खोल को ......
ओह !
खोल में कितने खोल ?
खोल पर कितने खोल ?
क्या खोल का खोट है
या खोल ही खोट है ?
आह !
खोट ही खोट
और खोट पर
ये कैसा नोंच खसोंट ?
फिर खसोंट से खून
या खून का ही खून ?
खोज रही हूँ खुद को
या खो रही हूँ खुद को ?
हाँ !
खाली खोल से
खोल रही हूँ खुद को .

Friday, March 18, 2016

आँखों में सरसों फूला .....

आँखों में सरसों फूला
फागुन अपना रस्ता भूला
पहुँच गया मरुदेश में
जित जोगी के वेश में 

चिमटा बजाता , अलख जगाता
मस्ती में प्रेम - धुन गाता
प्रेम माँगता वह भिक्षा में
जित जोगिन की प्रतीक्षा में

कभी तो झोली भर जाएगी
जोगिनिया उसकी दौड़ी आएगी
अंबर से या पाताल से
वर लेगी उसे वरमाल से

हरा , गुलाबी , नीला , पीला
प्रेम का रंग हो इतना गीला
सब बह जाए उसी धार में
सुख सागर के विस्तार में

धुनिया का बस एक ही धुन
हर द्वार पर करता प्रेम सगुन
इस फागुन में सब रस्ता भूले
औ' आँखों में बस सरसों फूले .

Friday, March 11, 2016

हरफ़ों में ........

बहुत दफ़न हैं हरफ़ों में , हम भी हो जायेंगे
उन बहुतों के बीच , कभी-कभी दिख भी जायेंगे

कुछ हरफ़ उठा वे लेंगे तो कुछ हरफ़ पकड़ लाएंगे
कुछ हरफ़ खुद आएंगे तो वे कुछ हरफ़ ले आएंगे

यक़ीनन हरफ़-हरफ़ हम न कभी पढ़े जाएंगे
व उनके हरफ़ों से ही हरफ़-बहरफ़ गढ़े जायेंगे

अगरचे ये हमाक़त ही तो हमारी जिंदगी है
गोया हरफ़ों के बंदीखाने में अक़दस बंदगी है

बखत की बंदिशें हैं और ये ख़यालात बेमिजाज़ी है
आज और अभी हरफ़ों की जीती हुई हर बाजी है

दफ़न हो जाएंगे हम पर ये हरफ़ ख़ाक न होंगे
अजी !शोला-ये-शौक है ये जो कभी शाक न होंगे . 

Thursday, March 3, 2016

चुम्मा पर चुम्मा .......

राजा जी !
आपके रोज-रोज के
ये आम सभा वो खास सभा
ये पक्षी भाषण तो वो विपक्षी भाषण
कभी ये उद्घाटन तो कभी वो समापन ....
फिर कभी ये मीटिंग तो कभी वो सेमीनार
नहीं तो ये पार्टी-फंक्शन नहीं तो वो तीज -त्यौहार
कुछ नहीं तो ये बीयर बार नहीं तो वो डांस बार
ऊपर से आये दिन जनता दरबार
तिस पर बहस , बयान , ब्रेकिंग न्यूज और समाचार .....
दिखाने के लिए ये गाँव और वो देहात
देखने के लिए ओवर ब्रिज और वो दस लेन वाला पाथ
फिर बात -बेबात पर भर लेते हैं फॉरेन उड़ान
जैसे ठप पड़ा हो वहां का भी सब काम...........

राजा जी !
दिन-रात यही सब देखकर मैं पक गयी हूँ
आपकी महिमा सुन ऊबकर , चिढ़कर मैं थक गयी हूँ
बहुत हुआ , अब यही कहूँगी -
राजा जी ! मत मरो राज में
अब मुझको दो न चुम्मा
मैं तो बस तुमसे चुम्मा मांगू
मत पकड़ाओ अपना नौटंकी वाला झुनझुन्ना ........
पता है ये जो गहना , जेवर , गाड़ी , बँगला हैं न
उसे तुम हमारे लिए ही करते रहते हो
हर साल दुगुना , तिगुना , चौगुन्ना
पर उससे मैं नहीं खुश हूंगी , होगा बस आपका मुन्ना
मैं तो मांगू तुमसे , अब तो बस चुम्मा
राजा जी ! मत मरो राज में
मुझको दो न चुम्मा

ओ मेरी हठीली रानी जी !
हो भी जाओ थोड़ी सयानी जी
कभी राजा जी नहीं मरते हैं राज में
बस जनता मरती है उनके राज में
और हमें तो व्यस्त रहना पड़ता है
बस दिखावे के लिए काम काज में
फिर तो हमारी रोजी या मर्जी जब चाहे हम
उनको ही पकड़ा देते हैं कोई भी झुनझुन्ना ............
बस दो-चार उटपटांग बोलने भर की देरी है
उसी को वे खींचातानी करते-करते
बढ़ा देते हैं कई-कई गुन्ना
फिर अपने में ही मरते-कटते हैं
और तेरे राजा जी को ही रटते हैं
जैसे वे हों कोई दूधपीते मुन्ना ........... 

कुछ तो समझो , मेरी भड़कीली रानी जी !
हम तो बस अपने फॉरेन वाले फादर के
रूल -ऑडर को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं
उनमें ही फूट डालकर बस अपने फुट पर नचाते हैं
वे ही तो हैं हमारे एकदम से असली झुनझुन्ना ........

अब तुम ही बताओ , मेरी भोली रानी जी !
भला राजा क्यों मरे राज में
भले राज मरे हमारे ही राज में
वो भगवान भी तो नहीं जान सके हैं कि
हम होते हैं कितने भीतरगुन्ना

अत: हे नखरीली रानी जी !
मेरे लिए तुम लगी रहो या तो दिन -रात पूजा -पाठ में
या मर्जी तेरी ऐश -मौज करो अपने ठाठ में
चुन कर कोई भी पसंद का अपना झुनझुन्ना
और हम हर बार यूँ ही राजा बनकर
करते रहे धुम-धुम-धुम्मा-धुम्मा .............

फिर तुम अगर ख़ुशी-राजी हो तो
एक तुमको ही क्या
इसको , उसको , उसको , सबको
बस दिन -रात हम देते रहे
चुम्मा पर चुम्मा .

Friday, February 26, 2016

बालम बोलो क्यों वाम हुए ? .......

मैंने नहीं जगाया
सूरज खुद किरण कुँज ले कर आ गया
अपनी वेदी पर घुमा कर कोई मंतर बुलवा गया
और मुझे गले लगा कर तुझमें पिघला गया
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं खिलाया
कलियाँ खुद ही खिल कर कसमसाने लगी
वो कुआंरी कोपलिया भी कसक कर कुनकुनाने लगी
तब सब अपने रज से तेरा नाम मुझपर गुदाने लगी
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं चहकाया
चिड़ियाँ खुद ही चसक कर चहचहाने लगी
फिर मेरी डाली कंपा कर पत्तियों को दरकाने लगी
और मेरी अमराई को अंगराई दे दे कर तुझे बिखराने लगी
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं बहाया
हवा खुद कहीं से उठी और बहक गयी
एक सिहरी सनसनाहट मन-प्राणों में मानो छिटक गयी
और तुझसे झड़कर तेरी ये कस्तूरी भी महक गयी
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं बरसाया
भरा बादल आया और खुद ही बरस गया
फिर मुझसे धुला पुँछा कर भीतर से ऐसे हरस गया
सहसा चौंका , स्तब्ध हो मुझमें जैसे तुझे परस गया
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं गवाया
गीत खुद ही अधरों पर आ गाने लगा
एक सुमनित सुमिरनी से गूँथ कर नया प्राण पाने लगा
और सब दिशाओं से गूँज-गूँज कर तेरा ही स्वर आने लगा
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

मैंने नहीं नचाया
नाच खुद ही खुद को नचाने लगा
फिर मेरी लाज को सतरंगी चुनर बना कर लहराने लगा
और मेरे मना करने पर भी रोम-रोम में तुझे ही थिरकाने लगा
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
क्या इस वामा से बदनाम हुए ?

तेरी सौं सच कहती हूँ-
मैंने नहीं बुलाया
चाँद खुद ही घर आ गया
और मतवाला मधु से मुझे ऐसे नहला गया
जैसे वही मदनलहरी से लहरा लहरा कर मधुयामिनी को पा गया
मैंने कुछ नहीं किया फिर तो
बालम बोलो क्यों वाम हुए ?
मेरी सौं सच सच कहो -
इस वामा के ही तो तुम नाम हुए . 

Monday, February 22, 2016

नहीं अट पायेगी मेरी कविता.......

कोई बम फोड़े या गोली छोड़े
या आग लगाये
अपनी ही बस्ती में
मैं तो डूबी रहती हूँ
बस अपनी मस्ती में ....
लिखती रहती हूँ प्रेम की कविता
कभी आधा बित्ता कभी एक बित्ता
कभी कोरे पन्नों को
कह देती हूँ कि भर लो
जो तुम्हारे मन में आए -
भावुकता , आत्मीयता , सरलता , सुन्दरता
या भर लो विलासिता भरी व्याकुलता
या फिर कोई भी मधुरता भरी मूर्खता .....
कैसे कह दूँ कि नहीं पता -
कि नप जाएगी मेरी कविता
किसी भी शाल या शंसनीय पत्रों के फीता से
या फिर मुझे ये कहना चाहिए
कि पता है मुझे -
बहुत ही छोटा है सारा फीता
जिनमें कभी भी नहीं अट पायेगी
मेरी कविता .

Tuesday, February 16, 2016

बीनी बीनी बसंत बानी ......

बीनी बीनी बसंत बानी
तरसे तरसे तन्वी तेवरानी
अंग अंग अजबै अंखुआनी
पोर पोर पुरेहिं पिरानी
सिरा सिरा सिगरी सिकानी
रुंआ रुंआ रुतै रूमानी
सांस सांस सौंधे सोहानी
रिझै रिझै रमनी रतिरानी
मनहिं मनहिं मयूर मंडरानी
कहैं कहैं कइसे कहानी ?
सीझै सीझै सुलगे सधुआनी
तरसे तरसे तन्वी तेवरानी
बीनी बीनी बसंत बानी

बीनी बीनी बसंत बानी
सरसे सरसे सजनी सयानी
उड़ि उड़ि उछाह उसकानी
झूमत झूमत झनके झलरानी
सरकै सरकै समूचा सावधानी
बोलत बोलत बिहंसे बौरानी
अपने अपने अति अभिमानी
चिहुंक चिहुंक चले चपलानी
हुमकत हुमकत हेराये हुलरानी
चंपई चंपई चारुचाह चुआनी
बुंदन बुंदन बास बरसानी
सरसे सरसे सजनी सयानी
बीनी बीनी बसंत बानी .

Wednesday, February 10, 2016

सुनो रे आली ! .......

सुनो रे आली !

मेरे प्रिय की
हर बात है निराली !
वो मतवाला
मैं भी मतवाली
मतवाली हो कर मैं
कण- कण में
उस को ही पा ली !

सुनो रे आली !

प्रिय अलिक तो
मैं कुंचित अलका
प्रिय अधर तो
मैं अंचित अधर का !

प्रिय मनहर नयन
तो दृष्टि हूँ मैं
प्रिय है कल्पवृक्ष
तो इष्टि हूँ मैं !

प्रिय पद्म -कपोल
सुमन -वृष्टि हूँ मैं
प्रिय सौंदर्य -मुकुर
तो नव -सृष्टि हूँ मैं !

प्रिय ह्रदय तो
पुकार हूँ मैं
प्रिय श्वास तो
तार हूँ मैं !

प्रिय प्रकृति तो
श्रृंगार हूँ मैं
प्रिय प्राण तो
संचार हूँ मैं !

प्रिय शून्य तो
आधार हूँ मैं
प्रिय पिंड तो
भार हूँ मैं !

प्रिय रूप तो
मैं काया हूँ
प्रिय धूप तो
मैं छाया हूँ !

प्रिय सावन तो
घटा हूँ मैं
प्रिय इन्द्रधनुष तो
छटा हूँ मैं !

प्रिय है मलयज तो
सुगंध हूँ मैं
प्रिय प्रसुन तो
मकरंद हूँ मैं !

प्रिय सरस नीर
मैं गम्भीरा सरिता
प्रिय लोल लहर
मैं मृदु पुलकिता !

प्रिय वन कुञ्ज तो
मैं मुग्धा बयार
प्रिय जलकण तो
मैं मधुर फुहार !

प्रिय स्वर्ण निकष
तो मैं कनक -कामिनी
प्रिय गंभीर गर्जन
तो मैं स्निग्ध दामिनी !

प्रिय है अम्बर
तो विस्तार हूँ मैं
प्रिय है धरा
तो आकार हूँ मैं !

प्रिय प्रकाश तो
मैं झलमल हूँ
प्रिय रात तो
मैं कलकल हूँ !

प्रिय अरुण तो
अरुणिमा हूँ मैं
प्रिय चन्द्र तो
मधुरिमा हूँ मैं !

प्रिय स्वप्न तो
जागरण हूँ मैं
प्रिय चित्त तो
चिंतवन हूँ मैं !

प्रिय उत्सव तो
उद्गार हूँ मैं
प्रिय प्रलय तो
हाहाकार हूँ मैं !

प्रिय आनन्द तो
मुदित हास हूँ मैं
प्रिय विषाद तो
अटूट आस हूँ मैं !

प्रिय अर्घ तो
अर्पण हूँ मैं
प्रिय तृषा तो
तर्पण हूँ मैं !

प्रिय रामरस तो
खुमारी हूँ मैं
प्रिय बाबरा तो
तारी हूँ मैं !

प्रिय यौवन मद तो
क्रीड़ा हूँ मैं
प्रिय परिरम्भन तो
व्रीड़ा हूँ मैं !

प्रिय राग तो
गीत हूँ मैं
प्रिय पुलक तो
प्रीत हूँ मैं !

प्रिय बिंदु तो
मैं रेखा हूँ
प्रिय लिखे तो
मैं लेखा हूँ !

प्रिय मौन तो
मैं वाणी हूँ
प्रिय वैभव तो
मैं ईशानी हूँ !

प्रिय मिलन तो
वियोग हूँ मैं
प्रिय जप तो
योग हूँ मैं !

प्रिय नाद तो
वाद्य हूँ मैं
प्रिय ओंकार तो
आद्य हूँ मैं !

प्रिय ध्यान तो
अभ्यर्चना हूँ मैं
प्रिय तप तो
प्रार्थना हूँ मैं !

प्रिय संकल्प तो
सिद्धि हूँ मैं
प्रिय विषय तो
वृद्धि हूँ मैं !

प्रिय रत्न तो
कनि हूँ मैं
प्रिय शंख तो
ध्वनि हूँ मैं !

प्रिय अपरिमित तो
परिधि हूँ मैं
प्रिय निरतिशय तो
निधि हूँ मैं !

सुनो रे आली !

मैं प्रिय की प्रिया !
प्रतिपल एक ही हैं
कहने को दो हम !
महासुख ने ही
हर घड़ी , हर घड़ी
हमें किया है वरण !
तब तो हर बात है
इतनी निराली !

सुनो रे आली !

Wednesday, February 3, 2016

एक रंग में रंगे हैं ......

एक रंग में रंगे हैं गिरगिट
गला जोड़कर , गा रहे हैं गिटपिट-गिटपिट

एक रंग में रंगे हैं मकड़े
सफाई-पुताई को ही झाड़े , झाड़ू पकड़े

एक रंग में रंगे हैं छुछुंदर
कब किस छेद से बाहर , कब किस छेद के अंदर

एक रंग में रंगे हैं मेंढक
लोक-वाद लोककर , जाते हैं लुढक-पुढक

एक रंग में रंगे हैं साँप
जब-तब केंचुली झाड़कर , देते हैं झाँप

एक रंग में रंगे हैं घड़ियाल
घर-घर घुस जाते , लिए जाली जाल

एक रंग में रंगे हैं बगुले
गजर-बाँग लगा , लगते हैं बड़े भले

एक रंग में रंगे हैं गिद्ध
मुर्दा-मर्दन का अंत्येष्टि करके , हुए प्रसिद्ध

एक रंग में रंगे हैं लोमड़ी
मुँह से लहराकर , रसीले अंगूरों की लड़ी

एक रंग में रंगे हैं सियार
यार-बाज़ी के लिए , एकदम से तैयार

एक रंग में रंगे हैं हाथी
हथछुटी छोड़ , हों चींटियों के सच्चे साथी

एक रंग में रंगे हैं गधे
शेर की खाल ओढ़ने में , कितने हैं सधे

इसी एक रंग से रंगती हैं सरकार
रँगा-रँगाया , रंगबाज़ , रंगरसिया, रंगदार

जिनके हाथों के बीच के हम मच्छड़
जाने कब ताली पीट दे या दे रगड़

इनसे बचने का तो एक भी उपाय नहीं
हाँ! जी हाँ! हम मच्छड़ ही हैं कोई दुधारू गाय नहीं .